मोढेरा का सूर्य मंदिर
सन १०२५-२६ में निर्मित, मोढेरा का सुर्य मंदिर वडनगर के सूर्य मंदिर से कई गुना विशाल है और वह है भी ज्यादा अच्छी स्थिति में। दोनों मंदिरों से सूर्य की मुख्य प्रतिमा गायब है। निर्विवादरुप से मोढेरा का मंदिर वडनगर के मंदिर के बाद बना हुआ है।


मोढेरा का सूर्य मंदिर संकुल तीन अलग अलग हिस्सों का बना हुआ है। समग्र संकुल पुर्वाभिमुख है और पुर्व से पश्चिम दिशा में जाता है। पूर्व में सबसे पहले विशाल सूर्य कुंड है। उस की लंबाई ५३.६ मीटर और चौडाई ३६.६ मीटर है। यह समकोणीय कुंड विभूषित शिल्प से भरी सीढियांवाली दिवारों का बना है। सूर्य कुंड स्वच्छ पानी से भरा रहता था। सुबह के सूर्य प्रकाश में झगमगाता हुआ भव्य मंदिर और उस का विशाल कुंड के पानी में दिखाई देता झिलमिल प्रतिबिंब, पूर्व से आते हुए किसी भी मुलाकाती के सामने एक अदभूत दृष्य खडा करता होगा।

यह संकुल का दूसरा हिस्सा है सभा मंडप। यहां पर विभिन्न प्रकार की धार्मिक प्रवृत्तियां - प्रार्थना, नृत्य और संगीत सभाएं - होती होगी। समग्र संकुल में सभा मंडप बारिक अलंकृत शिल्पों से सब से अधिक प्रचूर है। यहां पर हर एक शिल्प इतना सुंदर है कि उन के शिल्पकारों के कला-कौशल्य पर आश्चर्य होता है। रेतीले पत्थरों में ईतना बारिक और जीवंत शिल्प विश्व में अन्य किसी स्थान पर नही है। पूरा सभा मंडप एक संपूर्ण संतुलित ढांचा है। विश्व में पत्थरों के जो भी सर्जन देखने मिलते हैं, उन में यह सूर्य मंदिर का सभा मंडप गर्व से अपना स्थान बनाये हुए है।

यह संकुल का तीसरा हिस्सा सूर्य का मंदिर स्वयं है। सूर्य के मंदिर के दो भाग है - गर्भ गृह और गूढ मंडप। गर्भ गृह में सूर्य की प्रतिमा हुआ करती थी।


पूरा मंदिर संकुल विभिन्न प्रकार के सुंदर शिल्पों से भरा पडा है। इन में सूर्य देव की अनेक अलग अलग प्रतिमाएं हैं। किंतु इन प्रतिमाओं में, गर्भ गृह के द्वार के ठीक उपर आयी सूर्य को बैठे हुए दिखाती ग्यारह प्रतिमाएं ध्यानाकर्षक हैं। समग्र विश्व में, मोढेरा के सूर्य मंदिर के सिवा, अन्य किसी स्थान पर सूर्य देव को बैठे हुए दिखाती एक भी प्रतिमा नही है। वास्तव में, विश्व में कहीं पर भी सूर्य देव के इतने वैविध्यपूर्ण और इतने सुंदर शिल्प नहीं हैं।

मोढेरा के सूर्य मंदिर के बारे में ज्यादा जानकारी के लीए देखें:
१. सूर्य मंदिर मोढेरा (विजय एम. मिस्त्री, केतन एम. मिस्त्री, और मणीभाई मिस्त्री द्वारा निर्मित और धीरु मिस्त्री और ऋषिराज मिस्त्री द्वारा दिग्दर्शित एक बहुत सुंदर डोक्युमेन्टरी विडियो )
२. मोढेरा लेखक मणीलाल मूलचंद मिस्त्री (श्री सयाजी बाल ज्ञानमाला, १९३५ द्वारा प्रकाशित एक आधिकारिक पुस्तक)

मंदिरों का नगर
वडनगर को मंदिरों का नगर भी कहा जा सकता है। यहां विभिन्न देवी-देवताओं के ईतने सारे मंदिर हैं कि हर सौ गज के अंतर पर कोई न कोई छोटा-बडा मंदिर अवश्य दिखाई देता है। इन में से कुछ एक बहुत पुराने हैं, और कुछ कम पुराने हैं। पुराने मंदिर लाल और पीले रेतीले पत्थरों से बने हुए हैं, जब कि आधुनिक समय में बने मंदिरों में पत्थरों के उपरांत ईंटे और सीमेंट का भी उपयोग किया गया है। सभी मंदिरों में मनमोहक शिल्प देखने मिलते हैं। नगर में दो बडे मंदिर-संकुल हैं - एक अमथेर माता मंदिर, और दूसरा हाटकेश्वर मंदिर।



अमथेर माता मंदिर
वडनगर के एकदम पूर्व भाग में स्थित अमथेर माता मंदिर नगर का सबसे पुराना हयात मंदिर है। वास्तव में कभी यह अनेक छोटे-बडे मंदिरों का एक बडा संकुल रहा होगा, लेकिन आज इन में से सिर्फ छः मंदिर बचे हैं। यह मंदिर नक्काशीदार पत्थरों के विशाल उंचे ओटे पर बनाये गये है, जो कि कुछ खाजुराहो के मंदिरों की याद दिलातें हैं। इन में जो सब से बडा मंदिर है उसका द्वार पश्चिम की ओर है; और उस में अभी तो अंबाजी माता की प्रतिमा बिराजमान है। उस के बाहरी हिस्सों में पार्वती, महीषासुमर्दिनी, और अन्य देवताओं की मूर्तियां हैं। अंबाजी मंदिर के पिछे विष्णु, सप्तमातृका, सूर्य, एवं अन्य देवताओं के छोटे मदिर हैं। इन में सूर्य का मंदिर इस लिये ध्यान खिंचता है कि गुजरात में सिर्फ दो ही सूर्य मंदिर हैं - एक वडनगर में, और दूसरा मोढेरा में।



दोनों मंदिरों से सूर्य की मुख्य प्रतिमा गायब है। पूरे संकुल को देखते हुए यह लगता है कि, यहां से बहुत कुछ नष्ट हो चूका है, और जो बचा है वह जो था उसका अंश मात्र है। हो सकता है कि इस संकुल के बहुत कुछ अवशेष आसपास के विस्तार में जमीन के नीचे डटे हुए पडे हो, और वे नगर के पुरातन अवशेष साबित हो।


हाटकेश्वर मंदिर
हाटकेश्वर मंदिर संकुल ज्यादा बडा है और उस की ख्याति भी ज्यादा है। यह मंदिर समूह तेरहवीं सदी में बना हुआ है। इस में मुख्य मंदिर शिव को समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि वर्तमान शिव मंदिर का निर्माण भले ही तेरहवीं सदी में हुआ हो, लेकिन इसी स्थान पर हजारों वर्षों से शिव मंदिर अस्तित्त्व बनाये हुए है। अगर पुराने धर्मग्रंथों को माना जाय, तो यह शिव मंदिर महाभारत काल से भी पहले का है; और हाटकेश्वर का शिवलिंग स्वयं प्रकट हुआ 'स्वयंभू शिवलिंग' है। मंदिर के गर्भगृह में जहां पर शिवलिंग स्थित है, वह स्थान वर्तमान मंदिर के स्तर से बहुत नीचा है। शायद, यह हकीकत इस बात की द्योतक है कि पुराने ढांचे के मलवे पर नये मंदिर का निर्माण हुआ हो।



हाटकेश्वर मंदिर प्रशिष्ट शैली में बनाया गया है। मंदिर का मुख्य द्वार पूर्वाभिमुख है, लेकिन उत्तर और दक्षिण दिशाओं में उस के अन्य दो द्वार भी हैं। सभी द्वार भव्य हैं, और वे बारिक शिल्प से अलंकृत हैं। तीनों द्वारों से मंदिर के विशाल व हवादार मध्य-खंड में जाया जा सकता है। मध्य-खंड एक बहुत बडे गुंबज से ढका गया है। मध्य-खंड के पश्चिम में गर्भगृह है, जहां जाने के लिये कुछ एक सीढियां नीचे उतरनी पडती है। यहां पर विख्यात शिवलिंग बिराजमान है। इस के बराबर उपर बहुत उंचाई पर मंदिर का मुख्य शिखर है। यहां से उपर की ओर नजर डाली जाय तो ऐसा लगता है कि मानों हम अंतरिक्ष में खडे हैं। यहां निरव शांति और दिव्यता का अनुभव होता है।

हाटकेश्वर के समग्र मंदिर में बहुत सुंदर और बारिक शिल्प प्रचूर मात्रा में देखने मिलते हैं। मंदिर के अंदर और बाहर की दिवारों पर पुराण, रामायण, महाभारत, और अन्य कथाओं के दृष्यों को साकार करते जीवंत से लगते अनेक शिल्प हैं। कहीं पर भी बिनाशिल्प जगह नहीं दिखती। यह विभूषित शिल्प ही हाटकेश्वर की पहचान अन्य मंदिरों से अलग बनाते हैं।

सोमपुरा मंदिर

लोथल
मोहें-जो-दरो और हरप्पा के बाद सिंधु सभ्यता का तीसरा सब से बडा खोज निकाला गया नगर है लोथल। वह भारत के गुजरात राज्य में अहमदाबाद शहर से ८३ कीलो मीटर (५३ माईल्स) दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। सन १९५५ से १९६२ के वर्षों में वह आर्कीओलोजिकल सर्वे ओफ ईंडिया द्वारा विख्यात पुरातत्त्वविद डॉ. एस आर. राव के नेतृत्व में खोज निकाला गया था।


सरदार पटेल युनिवर्सिटी के प्राद्यापकों और विद्यार्थीओं के साथ डॉ. एस. आर. राव, १९६१

ईसा के पहले २,५०० और १,९०० के वर्षों में लोथल एक विकसित बंदरगाह था। वह चौडी साबरमती नदी द्वारा खंभात की खाडी से जुडा एक संरक्षित बंदरगाह था। बाद के वर्षों में खंभात की खाडी इस स्थल से पीछे हट कर पश्चिम की ओर चली गयी। उन दिनों, लोथल से नदी के रास्ते पश्चिम भारत में स्थित अन्य कई हरप्पा सभ्यता के नगरों तक पहुंचा जा सकता था। इस के कारण लोथल का व्यापारी महत्त्व बहुत बढ गया था। अपने समय में, वह पश्चिम भारत से लायी गयी अनेक प्रकार की चीजें अरबी समुद्र के रास्ते बाहरी दुनिया के देशों में निर्यात करता था और वहां से विविध चीजें यहां आयात करता था।



सन १९५५ में प्रारंभ हुए पुरातात्त्विक उत्खनन के आरंभ में ही यहां पर एक साथ कई बडे जहाज ठहर सके ऐसा एक बडा जहाजवाडा खुदाई में बाहर निकल आया। यह जहाजवाडा पकाई हुई उच्च गुणवत्तावाली ईंटों से बनाया गया था और उसमें विभिन्न ऋतुओं के बदलाव, पानी का बहाव, और माल-सामान ढोने से होनेवाली घिसाई को अच्छी तरह झेल सकने की क्षमता थी। जहाजवाडा का सबसे अनूठा लक्षण उसकी पानी को नियंत्रित करने की व्यवस्था थी। एक बार जहाजवाडा के अंदर जहाज आ जाने के बाद, यह व्यवस्था के कारण वे ज्वारभाटा तथा भाटा और नदी की बाढ से एकदम सुरक्षित हो जाते थे। अभी तक, पुरातत्त्वविदों को विश्व में कहीं से भी आज से चार हजार वर्ष पहले बनायी गयी ऐसी इंजीनियरी व्यवस्था का नमूना नहीं मिल पाया है।



रेल आयी
सन १८५२ में भारत में मुंबई और थाणे के बिच प्रथम रेल पटरी बिछाई गई। इस पटरी पर १६ अप्रिल १८५३ के दिन इन दो रेल स्टेशनों के बिच का ३४ किलो मिटर का फासला काटती हुई पहली रेल ट्रेन चली।



श्री जेठाभाई मारफतिया ने रखे हुए रिकार्ड के मुताबिक वडनगर में सन १९०७ तक के समय में रेलवे आयी। उससे यह नगर पूरे देश से जुड गया और व्यापार की सभी दिशायें खुल गयी। अब वडनगर और उसके आसपास के प्रदेश में उत्पादित माल-सामान दूर-सुदूर की जगहों तक निकास किया जा सकता था। उसी तरह दूर दूर के उत्पादन केंद्रों से विधविध चीजवस्तुएं इस नगर में आने लगी।



जल्द ही व्यापार बढने लगा और यह नगर कृषि और औद्योगिक पेदाशों की एक बडी मंडी बन गया। गुड के व्यापार का सारे गुजरात का यह सबसे बडा केन्द्र बन गया; यहां तक कि, वडनगर के व्यापारी गुड अहमदाबाद भेजते थे। उसी तरह, यह इमारती लकडी का भी महत्वपूर्ण केन्द्र बना। यहां के व्यापारी मयानमार (बर्मा), मलाबार, आसाम, और नेपाल से इमारती लकडी खरीद लाते थे और उसे अपनी सॉ-मिलों में काटकर सारे उत्तर गुजरात में बेचते थे। यहां के थोक व्यापारी पल्सिस, जीरा, और आइलसिड्स जैसी कृषि पेदाशों का बडा कारोबार चलाते थे।

वडनगर कपडे पर रंग चढाने और छापकाम करने के उद्योग का ख्यातनाम केन्द्र बना। यहां की भावसार और छिपा कोम, जो कि यह उद्योग चलाती थी, अपने कला-कौशल्य के लिये सारे गुजरात में नामना रखे हुए थी।

रेल स्टेशन की पुरानी छबियां और दस्तावेज श्री अमृत पटेल के सौजन्य से |


नवीन सर्व विद्यालय
सन १९४० में शेठश्री मानचंददास कुबेरदास पटेल ने अपने पिताजी श्री कुबेरदास पटेल की स्मृति में नवीन सर्व विद्यालय की स्थापना की। यह विद्यालय आगे जा कर हायर सेकन्डरी स्कूल बना। श्री मानचंददास वडनगर के सपूत थे और उनका मुंबई में बडा सफल कारोबार था। मूलतः उन्हों ने अनाथ बच्चों के लिए कुबेरवाडी नाम का बॉर्डिंग हाउस बनवाया था।



यह भवन उनके परम मित्र श्री पुरुषोत्तमदास हरिकरण सुथार, जो कि एक नामांकित स्थपति थे, की निगरानी में बना। जब श्री मानचंददास ने इसे विद्यालय में तबदिल करने का निश्चय किया, तब उसका सब कार्यभार श्री पुरुषोत्तमदास को सौंपा।



पहले तो विद्यालय एक वर्ग से शुरु किया गया, लेकिन अगले दस वर्षों में उसे पुर्णतः हाई स्कूल बनाया गया। अनाथ बच्चों के लिये एक अलग भवन का निर्माण किया गया। यह सारी योजना की विशिष्ट बात ये थी कि वह सार्वजनिक थी और उसके किये जरुरी पुरा धन श्री मानचंददास ने अकेले ही दान किया। उन्हों ने ना कभी किसी से मदद मांगी, ना कभी उसके विकास के लिये धन जुटाने में कोई हिचकिचाहट की।

सन १९५४ में श्री मानचंद्दास और सन १९५६ में श्री पुरुशोत्तमदास का निधन हो गया। लेकिन दोनों ने दूरदर्शिता दिखाते हुए अपने निधन से पहले ही विद्यालय की व्यवस्था श्री सुखरामभाई बेचरदास पटेल की अध्यक्षता में बनी एक स्थानिय समिति को सौंप दी थी। उनकी अगवानी में ही विद्यालय को हाय्र सेकंडरी स्कूल का दरज्जा हांसिल हुआ और विद्यार्थीओं की बढती संख्या को समाविष्ट करने हेतु एक नया मकान पुराने भवन के बगल में खडा किया गया। आधे शतक से भी पहले एक वर्ग से शुरु हुआ यह विद्यालय, आज विज्ञान के विद्यार्थीओं के लिये प्रथम पसंद का हायर सेकंडरी स्कूल माना जाता है।



अभी तक यह विद्यालय से शिक्षा पा कर बहुत से विद्यार्थीओं को लाभ पहुंचा है और कितने ही अपने अपने क्षेत्र में बहुत आगे बढे हैं।


यूनानी अनुसंधान
ईसा के पूर्व ३२६ में, मेसेडोनिया का महान सिकंदर, जो कि "एलेक्झांदर ध ग्रेट" के नाम से मशहूर हुआ, विश्व-विजेता बनने की ख्वाहिश में भारत की सीमा तक पहुंच गया। उस वक्त, आज के भारत और पाकिस्तान में बंटा हुआ सारा पंजाब प्रदेश पोरस नाम के राजा के अधिकार में था। झेलम के युध्ध में सिकंदर ने पोरस को पराजित कर के पंजाब से ले कर गुजरात की सीमाएं तक फैला पश्चिम भारत का एक बडा हिस्सा अपने कब्जे में कर लिया। अब सिकंन्दर की ईच्छा पूर्व की ओर आगे बढने की थी। वैसे तो, उत्तर-पूर्व में स्थित मगध के राजवी चन्द्रगुप्त जैसे भारत के अन्य शक्तिशाली नरेशों के मुकाबले, पोरस के पास कोई बहुत बडी सेना नहीं थी। फिर भी, उसने जिस बहादूरी और जोश से सिकंदर का मुकाबला किया, उस से सिकंदर की सेना हतप्रभ हो गयी और उस के होंशले कमजोर पड गये। उस के सभी सेनापति इस बात को ले कर भयभीत हो गये कि, एक छोटे से सीमावर्ती राज्य की सेना ऐसा द्रढ मुकाबला कर सकती है तो सचमुच में बडे राज्यों की सेनाएं कितनी शक्तिशाली होगी। सिकंदर के बहुतेरे सेनापति और सैनिक ओर आगे बढने के खिलाफ हो कर बगावत कर बैठे। उन्हों ने सिकंदर को भारत पर विजय पाने की महत्त्वकांक्षा छोडकर स्वदेश वापस लौटने पर विवश कर दिया। उसने पूर्व में आगे बढने का ईरादा तो छोड दिया, लेकिन अपने सेनापतियों और सेना को सिंधु नदी के किनारे होते हुए अरब सागर की ओर बढने के लिये समझा लिया। पंजाब के उत्तर से सिंधु के रास्ते पर निकलने से पहले उसने अपने स्थपतियों और मजदूरों को बीआस नदी के तट पर यूनान के ओलम्पीअन देवताओं को अर्घ्य देने के लिये बारह वेदियों का निर्माण करने का हूकम किया।

आठ सौ नौकाओं का एक बडा बेडा बनाया गया था और सिकंदर की आधी सेना नौकाओं पर सवार हो कर, जब की बाकी आधी सेना सिंधु के दोनों किनारों पर कूच करती हुई आगे बढी। सिकंदर और उस की सेना को इस रास्ते पर जो भी गतिरोध का सामना करना पडा उस पर उन्होंने आसानी से काबू पा लिया क्यों कि इस क्षेत्र में कोई बडे शक्तिशाली राज्य नही थे। ईसा के पूर्व जुलाई ३२५ में वह अरब सागर में सिंधु के मुख तक पहुंच गया। सिंधु नदी की दोनों प्रशाखाओं के रास्ते अरब सागर के तट तक के समग्र विस्तार की उसने छानबीन की। यहां से उसने अपनी आधी सेना को समुद्र के रास्ते यूनान वापिस भेजा और वह खूद बाकी आधी सेना ले कर जमीन के रास्ते अपने वतन वापिस लौट पडा।



सिकंदर एक महान विजेता ही नही, बल्कि एक समझदार फिलसूफ भी था। जितने समय तक वह भारत में रहा, उसने भारतीय फिलसूफ और पंडितों को आमंत्रित किया और उन्के साथ वाद-विवाद किया। उसने अपने सैनिकों को स्थानिय लोगों से मिलने-झूलने की और यहां की स्त्रीयों से विवाह करने की पूरी स्वतंत्रता दी। इस तरह विवाहित सैनिक अगर चाहें तो भारत में ही स्थायी हो कर रह सकते थे। इस के अतिरिक्त, सिकंदर ने अपने बहुत से प्रतिनिधि भारत में रख छोडे। जब उसकी सेना ने कच्छ प्रदेश से यूनान के लिए लौटना शुरु किया, तब बहुत से यूनानीओं ने यूनान वापिस लौटते वक्त उस लंबे और कठिन रास्ते में पडनेवाली मुसीबतों का सामना करने के बजाय, भारत में ही रहना पसंद किया। सिकंदर ने उनकी ईच्छा पर कोई रोक नही लगायी, बल्कि उसे प्रोत्साहित किया। वह चाहता था कि, भले ही वह भारत पर विजय हांसिल न कर सका, लेकिन वह हमेशां के लिये भारत पर यूनानी सभ्यता की छाप छोड जाये।

ईसा के पूर्व ३२५ में कच्छ विस्तार आनर्त प्रदेश का पश्चिमी सीमावर्ती भाग था। और, आनर्त प्रदेश की राजधानी आनर्तपुर (जिसे हम आज वडनगर के नाम से जानते हैं) बहुत ही समृध्धशाली नगर था। सिकंदर की सेना से विमुक्त हुए यह यूनानी अपने वतन में नगरवासी लोग हुआ करते थे, तो स्वाभाविक रुप से ही वे आनर्तपुर से आकर्षित हो कर कच्छ से उसकी ओर निकल पडे, और यहां पहुंच कर नगर में बस गये। यूनानी उजले वानवाले, घूंघर बालवाले, तेजस्वी आंखेवाले, सुडौल शरीर-सौष्ठववाले, और बुद्धीमान थे। भारतीयों की तरह ही वे अनेक देवी-देवताओं के पूजक थे। यूनान से भारत तक आते हुए रास्ते में उन्हों ने अनेक विजयी युध्ध किये थे और लूट में बहुत धन-दोलत ईकठ्ठी की थी। जो यूनानी समूह आनर्तपुर आये, उनमें पुरुष ज्यादा थे और महिलाएं बहुत कम थीं । लेकिन उनको नगर की सुंदर स्त्रीयों से विवाह करने में कोई बाधा नही आयी। कुछ ही समय में वे नगर के लोगों में पूरी तरह संमिलित हो गये। हाटकेश्वर जिसके ईष्टदेव है वह नागर समाज की उत्पत्ति के बारे में जो अनेक अनुमान प्रचलित हैं, उनमें से एक यह है कि वह सिकंदर की सेना से विमुक्त हो कर जो यूनानी इस नगर में आये उनसे उत्पन्न समाज है।



बहुत समय बित जाने के बाद भी यह किवंदती बनी रही है। शर्मिष्ठा के किनारे और दूसरी जगहों पर हुए पुरातत्त्वीय उत्खनन से जो यूनानी सिक्के और दूसरे यूनानी अवशेष मिले हैं वे इस मान्यता की पुष्टि करते हैं। नागरों में प्रवर्तमान व्याप्त यह मान्यता कि वे कच्छ से आये हैं, काफि मजबूत जड रखे हुए है और उसे हलके से नहीं ले जा सकता। नागरों और यूनानीओं में जो शारीरिक साम्यता पायी जाती है उकी उपेक्षा करना कुछ मुश्किल सा लगता है। उनमें नगर (शहर) में बसने की जो तीव्र नैसर्गिक झुकाव है, वह जैनिक परिबल के बराबर सी है।
यूनानी लहू नायक और सोमपुरा जैसी अन्य कोमों के लोगों की नसों में भी बहता होगा। यूनानी नाट्य और शिल्प जैसी कलाओं में बहुत निपुण थे। पुराने समय में भारत के विभिन्न प्रदेशों में संगीत और नृत्य कला का विकास तो हुआ था, लेकिन नाट्य-कला में वडनगर के नायक अग्रेसर थे। वैसे ही, यहां के सोमपुरा ने उत्तम यूनानी शिल्पों में जो यथार्थता और सफाई पाये जाते हैं उसी को प्रतिबिंबित करते हुए शिल्पों का सृजन किया। पुरातात्त्विक अन्वेषणों से भविष्य में कोई दिन हमें यूनानी अनुसंधान के ठोस सबूत मिल सकते हैं।

ग्रीस में देवी एथेना का मंदिर

अभी तक तो वडनगर में बहुत कम पुरातात्त्विक उत्खनन हुए हैं। और, जो उत्खनन हुए भी हैं, वह प्रायोगिक कक्षा के और पुराने नगर के बाहरी स्थलों पर हुए हैं। करिब दस चौरस किलो मीटर विस्तार का समग्र कृत्रिम टीला, कि जिस पर पुराना नगर बना हुआ है, अनन्वेषित रहा है; इसे तो पुरातत्त्वविदों ने अबतक छूया तक नहीं है। हो सकता है कि यहीं पर अमूल्य पुरातात्त्विक खजाना सारे विश्व के समक्ष खुला होने की राह देखता गडा पडा हो।


महाभारत में आनर्त राज्य
महाभारत के विभिन्न प्रसंगों में आनर्त राज्य की महत्व की भूमिका रही। इस बात का संदर्भ महाभारत की कथा में अनेक जगहों पर पाया जाता है।
महाभारत में आनर्त का संदर्भ महाभारत के पर्व छ अध्याय नव (महा. ६,९) में आनर्त राज्य और आनर्त के लोगों के बारे में अन्य लोगों के साथ निर्देश है: "पुंद्र, भार्ग, किरात, सुदेषणा, यमुना, साक,निशाध, आनर्त, कुंतल, और कुसाल।"

पांडव पुत्रों के लिए सुरक्षा स्थान और तालिमी केन्द्र के रुप में आनर्त
महाभारत के पर्व तीन अध्याय एक सौ बयासी (महा. ३,१८२) में कहा गया है कि, जब पांडवों को उनके राज्य से कौरवों ने निष्कासित किया तब द्रौपदी से हुए पांच पांडव पुत्रों को भी हस्तिनापुर से भेज दिया गया था। पहले वे पांचाल राज्य, जो कि उनके मातृपक्ष के नाना के शासन में था, और बाद में आनर्त राज्य में गये। आनर्त राज्य में वे जानेमाने आनर्त योध्धाओं से युध्ध की कला सीखे।



आनर्त राज्य में उसके पुत्र अपना समय कैसे व्यतित करते हैं इस का वर्णन कृष्ण इन शब्दों में द्रौपदी से करते हैः"तुम्हारे वे पुत्र शस्त्रों के विज्ञान के अभ्यास के प्रति समर्पित हैं, सुचारु वर्तन रखते करतें हैं, और उनका आचरण उनके सच्चे मित्रों के आचरण की तरह ही है। तुम्हारे पिताजी और भाईओं ने उनकी समक्ष राज्य और प्रदेश स्वीकार करने का प्रस्ताव रखा है, लेकिन लडकों को द्रुपद के निवास में एवं उनके मामाओं के यहां आनंद नही मिलता। तो वे सहिसलामत आनर्तों के प्रदेश में जा कर शस्त्रों के विज्ञान के अभ्यास में सबसे अधिक आनंद उठाते हैं। तुम्हारे पुत्र व्रिश्नीओं के नगर में प्रवेश करते हैं और वहां के लोग उन्हें त्वरित पसंद आते हैं। उन्हें किस तरह आचरण करना चाहिये उसके लिये जैसे तुम उन्हें मार्गदर्शन देती, अथवा माननिय कुंती देती, वैसे ही सुभद्रा सतर्कता से उनका मार्गदर्शन करती है। शायद वह उनका अधिक ध्यान रखती है। प्रद्युम्न जैसे अनिरुध्ध, अभिमन्यु, सुनित, और भानु का शिक्षक है, वैसे ही वह तुम्हारे पुत्रों का भी शिक्षक और आश्रयदाता है। और अच्छा शिक्षक, जो उन्हें भाला, तरवार, ढाल, अस्त्र, और रथ चलाने की कला, घुडसवारी करने, और बहादूर बनने के पाठ उत्तरोत्तर सिखाता है। और वह प्रद्युम्न, रुक्मणी का पुत्र, उन्हें बहुत अच्छी तालिम दे कर, विधविध आयुधों का योग्य उपयोग करने की कला सिखाने के बाद, तुम्हारे पुत्रों और अभिमन्यु के पराक्रमी कार्यों से संतुष्ट होता है। हे द्रुपदपुत्री! जब तुम्हारे पुत्र क्रिडा के लिये बाहर जाते हैं, तो हर एक के साथ में रथ, घोडे, वाहन, और हाथी रहते हैं।"

बाद में कृष्ण पांडवों के निष्कासित नरेश युधिष्ठीर को बताते हैं कि पांडवों के पक्ष में लडने के लिये कौन कौन बहादूर आनर्त सेनापति और योध्धा तत्पर हैं। उनमें सातवत, दसार्ह, कुकुर, अधक, भोज, व्रिष्णी और मधु जातियां शामिल हैं। वे पांडवों के शत्रुओं को हराने के लिये तैयार हैं। हल जिसका आयुध है वह बलराम धनुष्यधारी, अश्व पर सवार, पैदल सैनिक, रथ और हाथी पर सवार योध्धाओं के आगेवान होगे।



आनर्त में कुंती
महाभारत के पर्व पांच अध्याय तिरासी (महा. ५,८३) में निर्देश है कि पांडवों के हस्तिनापुर से निष्कासन के काल में उनकी माता कुंती भी कुछ समय के किये आनर्त प्रदेश में रहीं।

महा युध्ध में आनर्तों का सम्बन्धन
महाभारत के पर्व पांच अध्याय सात (महा. ५,७) में हमें इस बात का विस्तृत विवरण मिलता है कि कौरवों और पांडवों के बिच होने वाले युध्ध में आनर्त योध्धाओं का साथ पाने के लिये आनर्तपुर की मुलाकात के वक्त दुर्योधन और अर्जुन दोनों के प्रयत्नों के क्या परिणाम आये।

कुछ आनर्त योध्धाओं ने कौरवों के सैन्य में शामिल होना पसंद किया, तो कुछ योध्धाओं ने पांडवों को साथ देना पसंद किया। यादवों के नरेश वासुदेव कृष्ण स्वयं पाडवों के साथ सम्बद्ध रहे। उन्हों ने युध्ध में कोई शस्त्र नही उठाने का वचन दिया, लेकिन उन्होंने उस में एक राजनीतिज्ञ, शांती के दूत, रण-नीति के सलाहकार, और अर्जुन के मार्गदर्शक एवं उसके रथ के सारथी के रुप में भाग लेने का निश्चय किया। न जाने क्यों, उन्हों ने बहुत योध्धाओं से बने नारायण के नाम से जाने जाता अपना सैन्य कौरवों के प्रमुख दुर्योधन को दिया।

कृष्ण के भाई बलराम की ईच्छा दुर्योधन की मदद करना और कौरव सैन्य के पक्ष में लडना थी। लेकिन ऐसा करने से बलराम को अपने ही भाई कृष्ण के सामने लडना पडता, क्यों कि कृष्ण ने पांडव प्रमुख अर्जुन के सारथी बनना पसंद किया था। तो, बलराम ने निष्पक्ष रहना पसंद किया। उन्हों ने युध्ध में बिलकुल ही भाग न लेने का निश्चय किया और वे सरस्वती नदी की तट-यात्रा पर चले गये।


आनर्त योध्धाओं का संहार
भोज यादव सेनापती कृतवर्म अपनी एक अक्षौहिणी सेना ले कर कौरवों से जुड गया। उसके सामने, दूसरा महान आनर्त सेनापती सत्यकी, जिस के पास भी एक अक्षौहिणी सेना थी, पांडवों के पक्ष में गया। ये दोनों अपनी अपनी सेना ले कर एक दुसरे के सामने लडे और वे स्वयं भी एक-दूसरे के साथ द्वंद्व-युध्ध में उतरे। (महा, ९,२१)


यह दोनों आनर्त सेनापती कुरुक्षेत्र के युध्ध से तो जीवित वापस आये। लेकिन उसके छत्तीस वर्षों के बाद एक दिन, उन में उस युध्ध के दरमियान अनुचित तरीके ईस्तेमाल करने की बात को ले कर विवाद छिड गया और क्योंकि दोनों मदिरा के नशे में थे वे मारामारी पर उतर आये। और जैसा कि गांधारी ने भविष्य-कथन कर रख्खा था, बाकी के यादवों के साथ वे भी एक-दूसरे से मारे गये। (मह. १६,३)
इस तरह्, कुरुक्षेत्र युध्ध इतने सारे आनर्त योध्धाओं के संहार का नीमित्त हुआ, कि इसके पश्चात आनर्तों के सैनिक आधिपत्य का अस्तांचल हो गया।

महाभारत के संदर्भः कृष्ण द्वैपायन व्यास का महाभारत, अंग्रेजी भाषांतरः कैसरी मोहन गांगुली, भारत प्रेस, कलकत्ता, १८८३-९७